कोशिश करने वालों की – हरिवंश राय ‘बच्चन’

I first time read this poem while standing in a queue in front of a mess in Kota. I didn’t qualify for the IIT in my first attempt and I was giving it a shot again. It has been over a decade now and the poem has not lost its potency in motivating me. I love it and thank senior Bacchan Ji for it.

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

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है प्रीत जहाँ की रीत सदा – इंदीवर

A truly patriotic song which can be heard all over India on 15 August and 26 January. It is informative as well. I like this song as it is not jingoistic or boasting. Some may disagree that India is getting regressive or such progressive society is a long gone story. I only have to say that even if one falls on the road for a moment, he/she doesn’t become any less important. India will rise up to its core values and we all have to work towards it – One person at a time.

जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आई
तारों की भाषा भारत ने, दुनिया को पहले सिखलाई

देता ना दशमलव भारत तो, यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था
धरती और चाँद की दूरी का, अंदाज़ लगाना मुश्किल था

सभ्यता जहाँ पहले आई, पहले जनमी है जहाँ पे कला
अपना भारत वो भारत है, जिसके पीछे संसार चला
संसार चला और आगे बढ़ा, ज्यूँ आगे बढ़ा, बढ़ता ही गया
भगवान करे ये और बढ़े, बढ़ता ही रहे और फूले-फले

है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहाँ के गाता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ

काले-गोरे का भेद नहीं, हर दिल से हमारा नाता है
कुछ और न आता हो हमको, हमें प्यार निभाना आता है
जिसे मान चुकी सारी दुनिया, मैं बात वही दोहराता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ

जीते हो किसीने देश तो क्या, हमने तो दिलों को जीता है
जहाँ राम अभी तक है नर में, नारी में अभी तक सीता है
इतने पावन हैं लोग जहाँ, मैं नित-नित शीश झुकाता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ

इतनी ममता नदियों को भी, जहाँ माता कहके बुलाते है
इतना आदर इन्सान तो क्या, पत्थर भी पूजे जातें है
उस धरती पे मैंने जन्म लिया, ये सोच के मैं इतराता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ

कारवां गुज़र गया – गोपालदास ‘नीरज’

This is undoubtedly my favourite Hindi poem. It has a very sad tone but I still love it. The reason being that it evokes many memories of childhood. My father use to sing this to us and I would fall asleep listening to it. Neeraj ji is a living legend and it is a travesty in this country that artists do not get the due respect .

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

पुष्प की अभिलाषा – माखनलाल चतुर्वेदी

I love this poem since I first read it in primary school. Simple words, powerful message!

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर, हे हरि, डाला जाऊँ

चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!

मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।

प्रयास

Written by my dear friend Abhishek Jain, the following poem conveys our collective feeling.
upsc
भर-भर के पन्ने तोड़ दी कलमें ,
इतना मगा कि पड़ गए सदमें।
किया यूज़ नीला कभी काला पैन ,
सजाया कॉपी को किया अंडरलैन।
सूरज उठा तब गए सोने को ,
मिला नहीं एक पल खोने को।
किया नहीं कभी नैन-मटक्का ,
फोकस रखा करते थे पक्का।

 

निकल गयी तोंद  गिर गए बाल ,
 घिस-घिस के हो गए बुरे हाल।
हर महीने की पढ़ी योजना ,
खुद की बनी पंचवर्षीय योजना।
कर-कर के मर गए अथक प्रयास ,
मंज़िल मिली न एक्को बार।
फिर भी मन न मचलता है ,
जानता है, प्रयास ही सफलता है।
by –
Abhishek Jain

अनुभूति – by Abhishek Jain

first love
मोबाइल को फुल रिचार्ज कराके ,
बिना बात के बातें करना ,
बात फिर भी ख़त्म न होती ,
प्रथम प्रेम की अनुपम अनुभूति।
सारी रात करवट ले-लेकर,
खुली आंखोँ से स्वप्न देखना ,
नींद कभी न पूरी होती ,
प्रथम प्रेम की अनुपम अनुभूति।
बात-बात पर गुस्सा होकर ,
यूहीं रूठना और मनवाना ,
 हर पल मेरे हृदय को छूती ,
प्रथम प्रेम की अनुपम अनुभूति।
प्रिय-विरह के दुःख में पिसकर ,
हर चेहरे में उसे देखना ,
मधुर मिलन के सपने बुनती ,

प्रथम प्रेम की अनुपम अनुभूति।
by –
Abhishek Jain

फिर कर लेने दो प्यार प्रिये – दुष्यंत कुमार

Just a thought..nothing personal in it… don’t read too much!

अब अंतर में अवसाद नहीं
चापल्य नहीं उन्माद नहीं
सूना-सूना सा जीवन है
कुछ शोक नहीं आल्हाद नहीं

तव स्वागत हित हिलता रहता
अंतरवीणा का तार प्रिये ..

इच्छाएँ मुझको लूट चुकी
आशाएं मुझसे छूट चुकी
सुख की सुन्दर-सुन्दर लड़ियाँ
मेरे हाथों से टूट चुकी

खो बैठा अपने हाथों ही
मैं अपना कोष अपार प्रिये
फिर कर लेने दो प्यार प्रिये

something like shayari

उन्होंने प्यार को मेरे अब आजमाना छोड़ दिया
भरोसा हो गया शायद कि अब ख्वाबों में आना छोड़ दिया
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कैसा करिश्मा है मेरे महबूब का
आग लगाता भी वही बुझाता भी वही
मिलता कैसे आराम उनके चाहने पर भी

कि दर्द भी वही दवा भी वही
कैसे भटक न जाऊं मैं यहाँ पर
कि मंजिल भी वही रास्ता भी वही
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कोई पूछे तो कैसे बताएं की हम क्या काम करते हैं
तुम्हारा नाम लेते हैं तुम ही को याद करते हैं
I have just beginning to write posts. So, it would be blasphemous if I try my amateurish hands on poetry. I shared poetry like work earlier also (here and here)  which I jotted down when life dictated them to me. Hope you found them worthy of reading.

पेचीदा पेंच जीवन के

कल जब तुम आओगे
सुकून भी होगा कशमकश भी होगी
कुछ आहें भी होंगी कुछ अफवाहें भी होंगी
सोचेंगे सब लोग तुम्हारे बारे में
करेंगे बात अब लोग हमारे बारे में
वो ख्याल जिन्हें कभी आवाज़ नसीब न हुई
कहे जायेंगे वो भी गैरों के अल्फाजों में
जहाँ न आदर होगा न श्रद्धा होगी
न विश्वास होगा न अहसास होगा
जब सुनेंगे हम उन्हें तमाशबीनों की तरह
कुछ हिचकिचाहट तो होगी
सिर्फ मोहब्बत में इतनी न होती
पर इबादत में तो होगी
कल जब तुम आओगे
कुछ मोहब्बत भी होगी कुछ इबादत भी होगी

क्यूँ विचलित कर जाते हो

जब एकाग्रचित हो मैं स्वप्न बुनता
प्रेम-पथिक बन जाने का
या जग को सुखद बनाने का
इस भंवर-जाल में तुमको ढूंढ़ता
या फिर मृग की तृष्णा को
स्वप्न समर्पित करके प्रियतम
जब मैं सुंदर घर बनाता
भावों के सागर में जब
डूब कर फिर उतराता रहता
तिल-तिल मैं जल कर जब
सहर्ष तुमको उजाला देता
निश्चल मेरा मन निरंतर
इन कर्मों से गीता लिखता
तब तुम मेरे प्रियवर
क्यूँ विचलित कर जाते हो
साँसों में जब बस चुके हो
ख्वाबों में क्यूँ आ जाते हो