अनुभूति – by Abhishek Jain

first love
मोबाइल को फुल रिचार्ज कराके ,
बिना बात के बातें करना ,
बात फिर भी ख़त्म न होती ,
प्रथम प्रेम की अनुपम अनुभूति।
सारी रात करवट ले-लेकर,
खुली आंखोँ से स्वप्न देखना ,
नींद कभी न पूरी होती ,
प्रथम प्रेम की अनुपम अनुभूति।
बात-बात पर गुस्सा होकर ,
यूहीं रूठना और मनवाना ,
 हर पल मेरे हृदय को छूती ,
प्रथम प्रेम की अनुपम अनुभूति।
प्रिय-विरह के दुःख में पिसकर ,
हर चेहरे में उसे देखना ,
मधुर मिलन के सपने बुनती ,

प्रथम प्रेम की अनुपम अनुभूति।
by –
Abhishek Jain
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Feeling the same way – by Norah jones

Feelin’ The Same Way

The sun just slipped it’s note below my door
And I can’t hide beneath my sheets
I’ve read the words before so now I know
The time has come again for me

And I’m feelin’ the same way all over again
Feelin’ the same way all over again
Singin’ the same lines all over again
No matter how much I pretend

Another day that I can’t find my head
My feet don’t look like they’re my own
I’ll try and find the floor below to stand
And I hope I reach it once again

And I’m feelin’ the same way…

 

How much love is there ?

If questioning would make us wise
No eyes would ever gaze in eyes;
If all our tale were told in speech
No mouths would wander each to each.

Were spirits free from mortal mesh
And love not bound in hearts of flesh
No aching breasts would yearn to meet
And find their ecstasy complete.

For who is there that lives and knows
The secret powers by which he grows?
Were knowledge all, what were our need
To thrill and faint and sweetly bleed?.

Then seek not, sweet, the “If” and “Why”
I love you now until I die.
For I must love because I live
And life in me is what you give.

THIS POEM INFUSES OODLES OF POWER AND PASSION IN ME…

सच है महज संघर्ष ही

 
सच हम नहीं, सच तुम नहीं सच है महज संघर्ष ही।

 

संघर्ष से हटकर जिये तो क्या जिये हम या कि तुम।
जो नत हुआ वह मृत हुआ ज्यों वृंत से झरकर कुसुम।
जो लक्ष्य भूल रुका नहीं
जो हार देख झुका नहीं
जिसने प्रणय पाथेय माना जीत उसकी ही रही।
सच हम नहीं, सच तुम नहीं सच है महज संघर्ष ही।

ऐसा करो जिससे न प्राणों में कहीं जड़ता रहे।
जो है जहाँ चुपचाप अपने आप से लड़ता रहे।
जो भी पिरिस्थतियाँ मिलें
काँटे चुभें किलयाँ खिलें
हारे नहीं इंसान, है जीवन का संदेश यही।
सच हम नहीं, सच तुम नहीं सच है महज संघर्ष ही।

हमने रचा आओ हमीं अब तोड़ दें इस प्यार को।
यह क्या मिलन, मिलना वही जो मोड़ दे मंझधार को।
जो साथ फूलों के चले
जो ढ़ाल पाते ही ढ़ले
यह जि़न्दगी क्या जि़न्दगी जो सिर्फ पानी सी बही।
सच हम नहीं, सच तुम नहीं सच है महज संघर्ष ही।

संसार सारा आदमी की चाल देख हुआ चकित।
पर झाँककर देखो दृगों में, हैं सभी प्यासे थकित।
जब तक बँधी है चेतना
जब तक हृदय दुख से घना
तब तक न मानूँगा कभी इस राह को ही मैं सही।
सच हम नहीं, सच तुम नहीं सच है महज संघर्ष ही।

अपने हृदय का सत्य अपने आप हमको खोजना।
अपने नयन का नीर अपने आप हमको पोंछना।
आकाश सुख देगा नहीं
धरती पसीजी है कहीं?
जिससे हृदय को बल मिले है ध्येय अपना तो वही।
सच हम नहीं, सच तुम नहीं सच है महज संघर्ष ही। 

 

-जगदीश

something like shayari

उन्होंने प्यार को मेरे अब आजमाना छोड़ दिया
भरोसा हो गया शायद कि अब ख्वाबों में आना छोड़ दिया
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कैसा करिश्मा है मेरे महबूब का
आग लगाता भी वही बुझाता भी वही
मिलता कैसे आराम उनके चाहने पर भी

कि दर्द भी वही दवा भी वही
कैसे भटक न जाऊं मैं यहाँ पर
कि मंजिल भी वही रास्ता भी वही
———–
कोई पूछे तो कैसे बताएं की हम क्या काम करते हैं
तुम्हारा नाम लेते हैं तुम ही को याद करते हैं
I have just beginning to write posts. So, it would be blasphemous if I try my amateurish hands on poetry. I shared poetry like work earlier also (here and here)  which I jotted down when life dictated them to me. Hope you found them worthy of reading.

पेचीदा पेंच जीवन के

कल जब तुम आओगे
सुकून भी होगा कशमकश भी होगी
कुछ आहें भी होंगी कुछ अफवाहें भी होंगी
सोचेंगे सब लोग तुम्हारे बारे में
करेंगे बात अब लोग हमारे बारे में
वो ख्याल जिन्हें कभी आवाज़ नसीब न हुई
कहे जायेंगे वो भी गैरों के अल्फाजों में
जहाँ न आदर होगा न श्रद्धा होगी
न विश्वास होगा न अहसास होगा
जब सुनेंगे हम उन्हें तमाशबीनों की तरह
कुछ हिचकिचाहट तो होगी
सिर्फ मोहब्बत में इतनी न होती
पर इबादत में तो होगी
कल जब तुम आओगे
कुछ मोहब्बत भी होगी कुछ इबादत भी होगी

क्यूँ विचलित कर जाते हो

जब एकाग्रचित हो मैं स्वप्न बुनता
प्रेम-पथिक बन जाने का
या जग को सुखद बनाने का
इस भंवर-जाल में तुमको ढूंढ़ता
या फिर मृग की तृष्णा को
स्वप्न समर्पित करके प्रियतम
जब मैं सुंदर घर बनाता
भावों के सागर में जब
डूब कर फिर उतराता रहता
तिल-तिल मैं जल कर जब
सहर्ष तुमको उजाला देता
निश्चल मेरा मन निरंतर
इन कर्मों से गीता लिखता
तब तुम मेरे प्रियवर
क्यूँ विचलित कर जाते हो
साँसों में जब बस चुके हो
ख्वाबों में क्यूँ आ जाते हो

practical guide to “I made my day”

I realised that every few days, I read or watch some inspirational stuff.  My motivation is not long lasting and needs frequent replenishments. While they tell about what all one should do to become the greatest, they remind me of my inability to become great. So I have borrowed from practical life a list of 10 commandments. I am sharing these not to help the readers but their family members (God help my family members also)

# The way you spend your days is the way you will end up spending your life. If you want to improve it, improve the next few hours.

# Contemplate where life is going for 10 minutes every day. Use the time in loo.

# Listen to good music everyday: it is a food for the spirit.

# Don’t take yourself too seriously; no one else does!

# Waste some money every year – on your mother, wife and sisters.

# Make peace with your past.

# Give away extra/ old things in your home. Enjoy the joy of giving. (and then shop yourself afresh)

# Love your body and respect it. No matter how you feel, get up, get dressed well and wear nice looks.

# You made mistakes when you were a child, your parents will make when they are old. Your children make mistakes because they are young, you will make when you get old. So, be at peace!

# Call your family often. You probably won’t have any new news to tell because you are not a media reporter. Still do make the call.

inspirational